*महिला आरक्षण बिल 2026:क्या 33% कोटा 2034 तक टला?विश्लेषण और भविष्य के समीकरण*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*महिला आरक्षण बिल 2026:क्या 33% कोटा 2034 तक टला?विश्लेषण और भविष्य के समीकरण*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) यह समाचार 31वें संविधान संशोधन बिल (महिला आरक्षण विधेयक) के लोकसभा में गिर जाने के बाद के राजनीतिक गतिरोध पर केंद्रित है। इसके मुख्य बिंदु देखें तो वोटों का गणित देखना जरूरी हो जाता है। पक्ष में 298,विपक्ष में 230 दो-तिहाई बहुमत (आवश्यक ~352) से काफी कम। ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटा विपक्ष की मांग है । जिससे बीजेपी हिचक रही है (ओबीसी वोट बैंक का विस्तार 50% आरक्षण सीमा और जातिगत आंकड़ों की कमी)। मूल 2023 कानून के अनुसार जनगणना व परिसीमन के बाद ही लागू संभावित 2034 से पहले असंभव है। नए प्रस्ताव में आगामी साल 2029 का लक्ष्य था लेकिन वह भी अटका है। भविष्य के विकल्प पर विचार करें तो जनगणना का आधार बदलना ( साल 2011 से साल 2027) विपक्ष से सुझाव लेना या संसद द्वारा संविधान संशोधन कर सीधे ओबीसी कोटा लागू करना लेकिन अदालतों में चुनौती का जोखिम। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में आगामी साल 2034 से पहले 33% महिला आरक्षण लागू होना अत्यंत कठिन है। महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का लोकसभा में गिरना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ है। आपके द्वारा साझा किए गए समाचार और तथ्यों के आधार पर यहाँ इस पूरी स्थिति का सटीक विश्लेषण दिया गया है। आगामी साल 2034 से पहले आरक्षण के लिए क्या कोई उम्मीद बची है?वर्तमान संवैधानिक और कानूनी स्थिति के अनुसार आगामी साल 2034 से पहले आरक्षण लागू होना एक अत्यंत कठिन चुनौती है लेकिन 'असंभव' नहीं। साल 2023 का कानून (सीमांकन की शर्त)मूल कानून के अनुसार आरक्षण जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation)से जुड़ा है चूंकि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया जटिल है इसलिए स्वाभाविक रूप से साल 2034 का समय सामने आता है। इसमें बीच का रास्ता है यदि सरकार विपक्ष की मांग को मानते हुए "परिसीमन की शर्त" को हटा दे और वर्तमान सीटों पर ही रोटेशन के आधार पर आरक्षण लागू करने का नया बिल लाए तो यह आगामी साल 2029 में संभव हो सकता है हालांकि दक्षिणी राज्यों के विरोध (सीटों के नुकसान का डर) के कारण सरकार ऐसा जोखिम लेने से बच रही है। बीजेपी की 'ओबीसी कोटे' पर हिचक का कारण देखें तो बीजेपी के लिए ओबीसी उप-कोटा केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि एक संवैधानिक और रणनीतिक पेच है ।
इसमें 50% की सीमा अहम है । इंदिरा साहनी केस के अनुसार कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता। यदि ओबीसी महिलाओं को अलग से कोटा दिया जाता है तो कुल आरक्षण इस सीमा को पार कर सकता है । जिसे अदालत में चुनौती दी जाएगी। इसमें राजनीतिक जोखिम देखें तो अभी बीजेपी का ओबीसी वोट बैंक काफी एकजुट है। अलग से राजनीतिक कोटा देने पर विभिन्न पिछड़ी जातियों के बीच 'हिस्सेदारी' को लेकर आपसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है। जो पार्टी के आंतरिक समीकरण बिगाड़ सकती है। विपक्ष का 'चक्रव्यूह' या लोकतंत्र की जीत?विपक्ष (विशेषकर कांग्रेस और क्षेत्रीय दल) ने इस कोटा के भीतर कोटा को अपनी मुख्य रणनीति बनाया है। इसे "लोकतंत्र की जीत" कहना इस बात का संकेत है कि विपक्ष अब इस बिल को केवल 'महिला अधिकार' के रूप में नहीं बल्कि 'सामाजिक न्याय' (Social Justice) के रूप में पेश कर रहा है। विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है बल्कि वह "अधूरे आरक्षण" के खिलाफ है। जो ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को बाहर रखता है। सरकार के सामने अब क्या विकल्प हैं? वो देखें तो विधेयक गिरने के बाद मोदी सरकार के पास सीमित लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प बचे हैं। विपक्ष के सुझावों (ओबीसी कोटा पर चर्चा) को शामिल कर एक नया सर्वसम्मत मसौदा तैयार करना। जनगणना में तेजी डिजिटल जनगणना को जल्द पूरा कर साल 2029 के चुनाव से ठीक पहले परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना। राज्यों की सहमति दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए 'सीटों की संख्या न घटाने' का स्पष्ट आश्वासन देना। महिला आरक्षण का मुद्दा अब संवैधानिक प्रक्रिया से निकलकर पूरी तरह राजनीतिक ध्रुवीकरण का मुद्दा बन गया है। आगामी साल 2034 की समयसीमा तकनीकी है लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर संविधान में संशोधन के जरिए इसे पहले भी लाया जा सकता है फिलहाल यह बिल राजनीतिक 'क्रेडिट वॉर' और 'जातिगत राजनीति' के पेच में फंस गया है। क्या आपको लगता है कि बिना जातिगत जनगणना के ओबीसी कोटे को शामिल करना कानूनी रूप से टिक पाएगा? (Photos Courtesy Social media)
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