✓BMC की पिछले 10 सालों में 229 स्कूलें मुंबई में बंद हो गई, क्योंकि../रिपोर्ट स्पर्श देसाई
16 जनवरी 2019 को मुंबई की जानी मानी मेकिंग डेमोक्रेसी वर्क ऑर्गेनाइजेशन संस्था प्रजा फाउंडेशन मुंबई महानगर पालिका स्कूलों में शिक्षा की स्थिति पर अपनी एक रिपोर्ट जाहिर कर बताया कि 86 वें संविधान संशोधन, 2002 के माध्यम से शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया और बच्चों के निशुल्क व अनिवार्य स्कूल अधिकार अधिनियम आरटीई 2009 में लागू किया गया था।
इस संदर्भ में चर्चा करते हुए श्री निताई मेहता ने (संस्थापक एवं ट्रस्टी प्रजा फाउंडेशन) कहा कि इस अधिनियम का उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर एवं वंचित समुदाय के लोगों को लाभान्वित करना था परंतु वही लोग गैर जिम्मेदार एवं और सक्षम शिक्षा विभाग का खामियाजा भुगत रहे हैं,एवं मुंबई महापालिका शिक्षा विभाग ने शिक्षा को ही बेसहारा छोड़ दिया हैं। जो यह सबसे बड़ी दुख दायक स्थिति है ।
9% की गिरावट के साथ बीएमसी स्कूलों में कुल नामांकन वर्ष 2016 17 में 3, 43, 621 से वर्ष 2017 और 18 में गिरकर 3, 11, 663 रह गया हैं । काल श्रेणी के विश्लेषण से पता चलता है कि नामांकन की गिरावट की स्थिति अभी भी जारी है और आगे जारी रही तो वर्ष 2027 और 28 तक बीएमसी स्कूलों में कोई छात्र ही होंगे नहीं।
इस अवसर पर संस्था की जेनिफर स्पेनियर ने बताया कि पिछले 5 सालों में 100 लगभग 100 थी या उससे कम छात्राएं वाली स्कूलों की संख्या वर्ष 2013 -14 में 311 से बढ़कर साल 2017 एवं 18 में 426 हो गई थी । जबकि पिछले 10 सालों में छात्राओं के द्वारा नामांकन नहीं किए जाने पर अथवा किसी दूसरे स्कूलों में स्थानांतरण के कारण 229 स्कूलें बंद हो गई हैं । इसके बावजूद बीएमसी के अर्थ संकल्प खर्च में 36% की वृद्धि हुई है । जो 2013 -14 के 1540 करोड रुपए से बढ़कर 2017 -18 में 2094 करोड रुपए हो गए हैं ।
अर्थ संकल्प में की गई इस वृद्धि के बावजूद, हंसा रिसर्च द्वारा हाल ही में घरेलू स्तर पर किए गए एक सर्वे में 94 जवाब दाताओं ने कहा है कि वह अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाना चाहेंगे ।
प्नजा के मेहता ने कहा आगे था की यू डिसाइड U DISE के जिला स्तरीय विवरणों में भी प्रवृत्ति दिखाई देती है । जहां बीएमसी एवं सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में नामांकन में गिरावट आई है । जबकि गैर मान्यता प्राप्त एवं गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में नामांकन में वृद्धि दर्ज की गई है । स्कूल स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में माता-पिता, विशेषज्ञों, शिक्षकों एवं स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों नगर सेवकों की भागीदारी को सक्षम बनाने के हेतु आरटीई अधिनियम के तहत स्कूल व्यवस्थापन समितियों याने एसएमसी का गठन किया गया जो उर्ध गामी दृष्टिकोण के साथ विद्यालय स्तर पर सुधार एवं अर्थ संकल्प के विषयों पर अपने सुझाव में मददगार बन सकते हैं और बने हैं । इस अवसर पर प्रजा के महस्के ने कहा था कि स्कूल व्यवस्थापन समिति यानी एस एम सी में उपस्थित आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2016-17 में 85% स्कूलों में तथा वर्ष 2817-18 में 83 स्कूलों में नगर सेवकों ने पार्षदों ने एसएमसी की एक भी बैठक में हिस्सा लिया न था ।
शाला विकास अखाड़ा याने एसटीपी तैयार करना एसएमसी का एक महत्वपूर्ण कार्य है । जिसके अंतर्गत विद्यालय के बुनियादी ढांचे वित्तीय एवं अन्य आवश्यक संसाधनों की मांग शामिल हैं, हालांकि 24 एसडीपी के नमूनों से यह पता चलता हैं कि इन स्कूलों के जरिए स्कूल में सुधार के लिए मांग या प्रस्ताव बनाने की ऐसी कोई कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की गई थी ।
श्री मेहता ने आगे कहा था कि अगर विद्यालय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया
को वास्तविकता में परिवर्तन करना हैं, तो एसएमसी के बारे में जागरूकता प्रशिक्षण और जिम्मेदारियों को मजबूत करने की आवश्यकता है और निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा प्रशासन की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी । जब तक समय पर रिपोर्ट, रखरखाव एवं शिक्षण परिणामों की निगरानी पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक बीएमसी नगरपालिका शिक्षा की स्थिति का विश्लेषण एवं अनुमान लगाने में सक्षम नहीं होगा । जो उसकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा सकता है । प्रजा ने बीएमसी से शिक्षण परिणामों की निगरानी के लिए तीसरे स्वतंत्र पक्ष के ऑडिटर की नियुक्ति का सुझाव दिया हैं। जो शिक्षा विभाग को वास्तविक स्थिति से अवगत कराने के साथ बेहतर गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने के लिए अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए भी सुझाव देंगे, लेकिन अगर यह कार्य नहीं हुआ या उसको नजरअंदाज किया गया तो आने वाले 10 सालों में बीएमसी स्कूलों में एक भी छात्र नहीं होगा। कहकर उन्होंने अपनी बात समाप्त की थी ।
/ रिपोर्ट : स्पर्श देसाई /मेट्रो सिटी पोस्ट के लिए
