मुंबई में कानून व्यवस्था के तहत बच्चों एवं महिलाओंके खिलाफ बढ़ती वारदातों में वृद्धि :प्रजा फाउंडेशन / रिपोर्ट स्पर्श देसाई
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मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
दिनांक 21 नवंबर को मुंबई की जानी मानी प्रजा फाउंडेशन ने अपना रिपोर्ट "मुंबई में पुलिस और कानून व्यवस्था की स्थिति 2019" जारी करने हुए प्रजा फाउंडेशन के संस्थापक निताई मेहता ने पत्रकारों को बताया था कि यह रिपोर्ट मुंबई में महिलाओं एवं बच्चों के प्रति वृद्धि हुए अपराधों में वृद्धि पर प्रकाश डालता हैं । यह रिपोर्ट नागरिकों की पुलिसकर्मियों के प्रति विश्वास के कमी पर भी ध्यान केंद्रित करता है । जब वह किसी अपराध के गवाह का सामना करते हैं । इस रिपोर्ट के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि विशेष रूप से बच्चों के खिलाफ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 पोस्को से संबंधित अपराधों को देखकर हैरान करने वाले आंकड़े सामने आते हैं कि मुंबई में कुल बलात्कारों के 69% यानि कि 784 मामलों में से 540 बच्चों पर किए गए हैं । ऐसा प्रजा फाउंडेशन के संस्थापक एवं ट्रस्टी नेता ने आज दिनांक 21 नवंबर को पत्रकारों को बताया । आगे उन्होंने कहा कि पोस्को के तहत साल 2018- 19 में दर्ज यौन अपराधों में 6 साल के कम उम्र के बच्चे थे ।
प्रजा फाउंडेशन के निदेशक मिलींद महास्के ने कहा कि यह भी जानकारी मिली है कि 90% सूचित पोस्को के मामलों में अपराधी लोग, पीड़ित के जान पहचान वाले ही थे । कानून व्यवस्था की कोई समस्या नहीं हैं । लेकिन हमारे समाज में यह आत्म निरीक्षण का विषय है कि हमारे बच्चों के साथ दुर्व्यवहार जान पहचान के लोगों के जरिए ही किया गया हैं । इस मामले से निपटाने के लिए कई स्तरों के मंच पर तत्काल कदम उठाना जरूरी हैं ।
प्रजा फाउंडेशन के जरिए हंसा रिसर्च ने किए एक सर्वे के मुताबिक कुल22,845 घरों से पता चला है कि पुलिस स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों से, आपराधिक मामलों की संख्या अधिक हो सकती हैं । कुल घरों में से 28% उत्तर दाताओं ने शहर में अपराध देखा हैं । जिनमें 15% लोगों ने पुलिस को सूचित नहीं किया था । इसी तरह 27% उत्तरदाताओं ने अपराध का सामना किया हैं । जिनमें 43% लोगों ने पुलिस को सूचित नहीं किया था । पुलिस को रिपोर्ट ना करने का प्रमुख कारण यह था कि पुलिस के जरिए हो रही परेशानी था । 25% उत्तर दाताओं ने अपराध देखा और 31% लोगों की अपराध सहा भी । 23% लोगों ने जिन्होंने अपराध देखा भी और सहा भी, उनके लिए पुलिस अधिकारियों से बात करना बहुत ही मुश्किल था । साल 2019 में आईपीसी के तहत जांच किए जाने वाले कुल 1,05,404 मामलों में से 69 प्रतिशत मामले साल के अंत तक जांच के लिए लंबित थे । इसके अतिरिक्त पूर्व डीजीपी संजीव दयाल द्वारा पारित स्थाई आदेश (दिनांक 24 जून 2015 ) के अनुसार नागरिकों को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए पुलिस तंत्र की जांच और कानून व्यवस्था को अलग रखा जाना था । हालांकि इसके बावजूद महत्वपूर्ण जांच अधिकारियों की कमी देखी गई थी । जुलाई 2019 तक एपीआई मसलन सहायक पुलिस निरीक्षकों की 41प्रश की कमी देखी गई थी और पुलिस उप निरीक्षकों की कमी देखी जाने की वजह से जांच में बड़ी देरी हुई थी । यह विशेष रूप से बलात्कार जैसे सघन जघन्य अपराधों के मामले में निरीक्षण कर रहे थे । जहां पर जांच पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने के लिए महत्वपूर्ण होता है ।
न्यायपालिका के सत्र पर भी एक खराब परीक्षण और कर्मचारियों की कमी देखी गई थी और यह पीड़ित पर भारी पड़ती हुई दिखाई दी थी। मुंबई में साल 2017 में आईपीसी के तहत अदालतों में आजमाए जाने वाले 2,28,635 मामलों में ,93% मामले साल के अंत तक सुनवाई के लिए लंबित थे । मार्च 2019 तक न्यायालय के न्यायाधीशों के पदों में भी 15% की कमी देखी गई थी । इसलिए व्यवस्था में बदलाव लाने की आवश्यकता देखी गई थी । इसी के वजह से मुंबई के कानून और व्यवस्था की स्थिति को काफी तौर पर मजबूत किया जा सकता हैं । स्वीकृत पदों के लिए प्रभावी पुलिस के लिए कुशल पुलिसकर्मियों से जगह भर देनी चाहिए, सत्र अदालत मामलों की समयसीमा तक पहुंचने के लिए यह आवश्यक है । न्यायिक पदों को भरने की भी आवश्यकता देखी जा रही हैं । न्यायिक पदों को भी पर्याप्त रूप से भरने की आवश्यकता है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस और नागरिक संबंधों को विश्वास निर्माण एवं जागरूकता के माध्यम से सुधारने की आवश्यकता हैं । ऐसा आखिर में निताई मेहता ने बताया था ।
•रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post # MCP•News Channel• के लिए...
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