• आपको पता है रेलवे में टॉइलेट कब से हुए शुरु? उसके लिए एक बंगाली बाबु अखिल उर्फ ओखिल मोशाय जिम्मेदार हैं /रिपोर्ट स्पर्श देसाई
√• आपको पता है रेलवे में टॉइलेट कब से हुए शुरु? उसके लिए एक बंगाली बाबु अखिल उर्फ ओखिल मोशाय जिम्मेदार हैं /रिपोर्ट स्पर्श देसाई
【मुंंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 】यह बात है सन 1909 की, जब ट्रेन में टाॅयलेट केवल प्रथम श्रेणी के डिब्बों में ही होते थे । सन 1891 से पहले ट्रेन की प्रथम श्रेणी में भी टाॅयलेट नहीं होते थे । एक बाबु अखिल उर्फ ओखिल बाबू मोशाय ने जम कर कटहल की सब्जी और रोटी खाई फिर निकल पडे अपनी रेल यात्रा पर । ट्रेन के डिब्बे में बैठे बैठे उनका पेट फूलने लगा और गर्मी के कारण पेट की हालत नाजूक होने लगी थी । ट्रेन अहमदपुर रेलवे स्टशेन पर रुकी तो ओखिल बाबू प्लेटफार्म से अपना लोटा भर कर पटरियों के पार हो लिये थे,दस्त और मरोड़ से बेहाल ओखिल बाबू ढंग से फारिग भी न हो पाये थे कि उतने में गार्ड ने सीटी बजा दी थी। सीटी की आवाज सुनते ही ओखिल बाबू जल्दबाजी में एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ से धोती को उठा कर दौड पड़े थे । इसी जल्दबाजी और हडबड़ाहट में ओखिल बाबू का खुद का पैर धोती में फंस गया और वो पटरी पर गिर पडे थे । इससे धोती खुल गयी थी, शर्मसार ओखिल बाबू के दिगम्बर स्वरूप को प्लेटफार्म से झांकते कई औरत मर्दों ने देखा, कुछ "संभलकर" बोले तो कुछ लोगों ने मुस्कुराकर सीन का मजा लिया, कुछ ओखिल बाबू के दिगम्बर स्वरूप पर ठहाके मारने लगे। ओखिल बाबू ट्रेन रोकने को जोर जोर से चिल्लाने लगे लेकिन ट्रेन चली गयी और ओखिल बाबू अहमदपुर स्टेशन पर ही छूट गये थे ।
ओखिल बाबू यानी अखिल उर्फ ओखिल चन्द्र सेन मोशाय नाम के इस यात्री को अपनी साथ घटी घटना ने बहुत विचलित कर दिया,तब उन्होने रेल विभाग के साहिबगंज मंडल रेल कार्यालय के नाम एक धमकी भरा पत्र लिखा जिसमें धमकी ये थी कि यदि आपने मेरे पत्र पर कार्यवाही नहीं की तो मैं ये घटना अखबार को बता दूंगा । उन्होने उपर बताई सारी घटना का विस्तार से वर्णन करते हुए अंत में लिखा कि यह बहुत बुरा है कि "जब कोई व्यक्ति टॉयलेट के लिए जाता है तो क्या गार्ड ट्रेन को 5 मिनट भी नहीं रोक सकता?'
मैं आपके अधिकारियों से गुजारिश करता हूं कि जनता की भलाई के लिए उस गार्ड पर भारी जुर्माना लगाया जाए। अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं इस पूरे वाक्ये को अखबार में छपवाऊंगा।"रेलवे से लेकर सरकार में तब इंसान रहते थे,उन्होने एक आम यात्री के इस पत्र को इतनी गंभीरता से लिया और अगले दो सालों में ट्रेन के हर डिब्बे में टाॅयलेट स्थाापित कर दिया गया। इस तरह तब से ट्रेन के हर डिब्बे में हमें
टाॅयलेट देखने को मिल रहा है । तो ट्रेन में जब भी टाॅयलेट का प्रयोग करो,ओखिल बाबू का शुक्रिया अदा करना ना भूले ! ओखिल बाबू का वो पत्र आज भी दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में सुरक्षित और संरक्षित है । "आइये आयु, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति तथा यथायोग्य संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार ही सही परन्तु प्रतिदिन एक नेक कार्य करे। कार्य छोटा ही सही परन्तु किसी के निजी जीवन मे अथवा समाज मे बड़े बदलाव का कारक बन सकता है ।【Photos Courtesy Google】
★ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई√•Metro City Post•News Channel•

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