√• प्लांटों में ऐसे बनती है कृत्रिम ऑक्सीजन, जानें, वायुमंडल में कितना है O2 का स्तर ?/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

√• प्लांटों में ऐसे बनती है कृत्रिम ऑक्सीजन, जानें, वायुमंडल में कितना है O2 का स्तर ?/रिपोर्ट स्पर्श देसाई



【मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई】भारत की गिनती मेडिकल ऑक्सीजन बनाने वाले चुनिंदा बड़े देशों में होती है। यहां बड़े पैमाने पर कृत्रिम ऑक्सीजन का उत्पादन होता है। अस्पतालों में इन दिनों ऑक्सीजन की मांग बढ़ गई है। जानें वायुमंडल में कितना है O2 का स्तर ?
सबसे पहले वायुमंडल में मौजूद हवा को अपने संयंत्रों में एकत्र करती हैं कंपनियांकई विधियों एवं प्रक्रिया से गुजरने के बाद गैस एवं लिक्विड रूप में मिलता है ऑक्सीजनसंयंत्रों में बने कृत्रिम ऑक्सीजन को उद्योगों एवं राज्यों को भेजा जाता है । देश में इन दिनों मेडिकल ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा हुआ है। अस्पतालों से लेकर सड़कों तक मेडिकल ऑक्सीजन के लिए जद्दोजहद देखने को मिल रही है। मेडिकल ऑक्सीजन की किल्लत कमी दूर करने के लिए सरकार लगातार कदम उठा रही है लेकिन कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले अस्पतालों की अपनी शिकायते हैं। ऑक्सीजन की कमी के चलते कई अस्पतालों में मरीजों के दम तोड़ने की रिपोर्टें हैं तो अस्पताल एसओएस संदेश भेजकर अपने लिए कुछ घंटों के लिए ऑक्सीजन का जुगाड़ करते पाए गए हैं। पिछले कुछ दिनों में राजधानी दिल्ली के कई अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी सामने आई। ऑक्सीजन की यह कमी हैरान करने वाली है।

वायुमंडल में 21 प्रतिशत है ऑक्सीजन ;

भारत की गिनती मेडिकल ऑक्सीजन बनाने वाले चुनिंदा बड़े देशों में होती है। यहां बड़े पैमाने पर कृत्रिम ऑक्सीजन का उत्पादन होता है। आइए जानते हैं कि संयंत्रों में ऑक्सीजन का निर्माण किस तरह से होता है और संयंत्रों से इसका वितरण कैसे किया जाता है। ऑक्सीजन पानी और हवा दोनों में होती है लेकिन मनुष्य पानी में मौजूद ऑक्सीजन को नहीं ले सकता। मनुषय को सांस लेने में दिक्कत होने पर उसे मेडिकल ऑक्सीजन दिया जाता है। हवा में 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और एक प्रतिशत अन्य गैसे होती हैं।  भारत में कई कंपनियां कृत्रिम ऑक्सीजन का निर्माण करती हैं।

प्लांट में ऐसे बनती है मेडिकल ऑक्सीजन:

संयंत्रों में क्रायोजेनिक डिस्टिलेशन प्रक्रिया से ऑक्सीजन का निर्माण किया जाता है। सबसे पहले हवा को एकत्र किया जाता है। इसके बाद हवा को फिल्टर किया जाता है ताकि उसमें मौजूद धूल-मिट्टी दूर हो जाएं। प्रि-फिल्टर, कार्बन फिल्टर और हेपा फिल्टर हवा को शुद्ध करने का काम करते हैं। फिल्टर हवा को दबाव डालकर कम्प्रेश किया जाता है।  इसके बाद एक मॉलिक्यूलर छलनी से इस हवा को छाना जाता है। ताकि अन्य गैसों नाइट्रोजन, कार्बन एवं अन्य गैसों को उससे निकाला जा सके। अन्य गैसों को निकालने के बाद इस हवा को डिस्टिलेशेन प्रासेस से गुजरना होता है। इस प्रक्रिया में हवा को ठंडा किया जाता है ताकि इस हवा को एकत्रित किया जा सके। इस हवा को 185 डिग्री सेल्सियस पर उबाला जाता है ताकि उसमें मौजूद नाइट्रोजन और अन्य गैस अलग हो जाएं। इस प्रक्रिया के बाद लिक्विड और गैस दो प्रकार की ऑक्सीजन प्राप्त होती है। देशभर में कोरोना वायरस बड़ी ही तेजी के साथ लोगों को संक्रमित कर रहा है,लेकिन इस बार देश सिर्फ इस वायरस की वजह से परेशान नहीं है। बल्कि इस बार ऑक्सीजन की कमी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों को अस्पताल में बेड नहीं मिल पा रहे हैं,और जिन्हें बेड मिल भी रहे हैं तो उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही है। लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि आखिर जो ऑक्सीजन हमारे वातावरण में है, वो सिलेंडर के अंदर कहां से आती है? इसे तैयार कौन करता है और कैसे होती है? शायद नहीं, तो चलिए आपको इस बारे में बताते हैं।

कैसे बनती है ऑक्सीजन?

हमारे वातावरण में काफी ऑक्सीजन है, लेकिन आपको बताते हैं कि आखिर सिलेंडर के अंदर ऑक्सीजन कहां से आती है। यहां आपको बता दें कि गैस क्रायोजेनिक डिस्टिलेशन प्रोसेस के जरिए ऑक्सीजन बनती है। इस प्रक्रिया में हवा को फिल्टर किया जाता है, ऐसा करने से धूल-मिट्टी इससे अलग हो जाती है। इसके बाद कई चरणों में हवा को कंप्रेस यानी उस पर भारी दबाव डाला जाता है।
इसके बाद कंप्रेस हो चुकी हवा को मॉलीक्यूलर छलनी एडजॉर्बर से ट्रीट किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पानी के कण, कार्बन डाईऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन इससे अलग हो सके। वहीं, जब ये प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो इसके बाद कंप्रेस हो चुकी हवा डिस्टिलेशन कॉलम में जाती है।  यहां पहले इसे ठंडा ( ये सब प्लेट फिन हीट एक्सचेंजर और विस्तार टरबाइन प्रक्रिया के जरिए होता है) और उसके बाद 185 डिग्री सेंटीग्रेट पर इसे गर्म किया जाता है, जिससे इसे डिस्टिल्ड किया जाता है। यहां आपको बता दें कि डिस्टिल्ड एक प्रक्रिया है, जिसमें पानी को उबाला जाता है और उसकी भाप को कंडेंस करके जमा किया जाता है। इस प्रक्रिया को कई बार अलग-अलग स्टेज पर किया जाता है। इसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और आर्गन जैसी गैसें अलग-अलग हो जाती हैं। इस प्रक्रिया के बाद ही लिक्विड ऑक्सीजन और गैस ऑक्सीजन मिलती है।

ये कंपनियां बनाती हैं ऑक्सीजन :

भारत में एक दो नहीं बल्कि कई ऐसी कंपनियां हैं,जो लोगों को जिंदगी देने वाली ऑक्सीजन बनाती हैं। यहां आपको ये भी जानना जरूरी है कि ये ऑक्सीजन महज मरीजों की जान ही नहीं बचाती, बल्कि स्टील, पेट्रोलियम जैसे कई उद्योगों में भी इसका इस्तेमाल होता है।

वहीं, नजर अगर ऑक्सीजन बनाने वाली कंपनियों पर दौड़ाएं तो इसमें :

आइनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स लिमिटेड, ऐलेनबरी इंडस्ट्रियल गैसेज लिमिटेड,रीफेक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड,नेशनल ऑक्सीजन लिमिटेड, भगवती ऑक्सीजन लिमिटेड, गगन गैसेज लिमिटेड ,लिंडे इंडिया लिमिटेड...।

अस्पतालों में ये कंपनिया कर रही है ऑक्सीजन सप्लाई:

टाटा स्टील, जो कि रोजाना तमाम अस्पतालों और राज्य सरकारो को 200-300 टन लिक्विड मेडिकल भेज रही है।  जिंदल स्टील जहां एक तरफ ओडिशा और छत्तीसगढ़ को 50-100 मीट्रिक टन ऑक्सीजन अस्पतालों को दे रहा है तो वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र में वो राज्य सरकार को रोजाना लगभग 185 टन ऑक्सीजन दे रही है। वहीं रिलायंस महाराष्ट्र सरकार और गुजरात सरकार को ऑक्सीजन दे रही है। आर्सेलर मित्तल निप्पों रोजाना अस्पतालों और राज्य सरकारों को 200 मीट्रिक टन तक ऑक्सीजन की सप्लाई कर रहा है। वहीं सेल ने अपने बरनपुर, बोकारो, भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला जैसी स्टील प्लांट्स से लगभग 33 हजार टन तक लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई की है। -साभार
【Photo Courtesy Google】

★ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई√Metro City Post•News Channel•

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